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राष्ट्र धर्म बनाम प्रजा धर्म

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विश्व मे कोरोना का कहर चीन से होते हुए यूरोप ,अमेरिका ,इस्लामिक देशों से भारत तक पहुंच गया।

किसी भी राष्ट्र पर जब विपत्ति आती है तो
क्या राष्ट्र धर्म है ?
क्या नीति होनी चाहिए ?
यह एक राजा को पता होना चाहिए एवं प्रजा का भी यह दायित्व है कि वे भी अपने धर्म का पालन करें।

भारत मे ठीक विपरीत हो रहा है आज राजा अपने राज धर्म का पालन कर रहा है पर प्रजा अपने कर्तव्यों से विमुख है।

हमारे राजा के पिता की मृत्यु हो जाती है पर राजधर्म का पालन करते हुए वे उनके संस्कार में सम्मिलित नहीं होते हैं पर प्रजा अपने धर्म का पालन नही कर रही है,वो राजआज्ञा का उलंघन लगातार कर रहीं है।

इसका उल्लेख रामायण में भी है
राम ने अपने पिता के वचनों का सम्मान करते हुए राजआज्ञा मानते हुए राजमहल त्याग दिया और चौहद वर्ष बनवास के लिए चले गए। उनके भाई लक्ष्मण भी अपने दायित्वों को निभाने अपने भाई के साथ चल दिये ,सीता अपने पत्नी धर्म का निर्वहन करती रही।
भरत ने भी सिंघासन पर शासन नही किया।सभी ने अपने कर्तव्यों का पालन किया ।

दूसरी तरफ रावण के अनैतिक कार्य को भी उसके परिवार ने पूर्ण विरोध किया परंतु राष्ट्र द्रोह किसी ने नही किया और सब अपने राजा के साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़े रहे और युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए परतु किसी ने भी राष्ट्रद्रोह नही किया।
जहाँ तक विभीषण का प्रश्न है उसने भगवान राम का साथ दिया परंतु अपने देश के लिए रावण को लगातार समझाते रहे और रावण द्वारा लात मार कर निकाले जाने तक रावण के साथ ही रहे।राम के साथ तो बहुत बाद में आये परंतु उसके उपरांत भी दूत भेज कर रावण को समझाने का बहुत प्रयास किया।पर विनाश काले विपरीत बुद्धि।

दोनो ही तरफ के लोग अपने राष्ट्र के साथ मजबूती से डटे रहे। असल में भारत के सनातन परंपरा व ज्ञान में राष्ट्रीयता की भावना कूट कूट कर भरी हुई है।

दूसरी तरफ आज जब राजा अपने राष्ट्र धर्म का पालन कर रहा है और आम जनता सड़क पर उतर गई हैं पुलिस और डॉक्टरों को ईटो और पत्थरों से मार रहे है।

ये अपने देश की संस्कृति नही है, किसी भी विपत्ति के समय सभी देशवासियों को एक साथ विपत्तियों से निपटना चाहिये न कि आपस मे ऐसा व्यहवार करना।जो किसी भी तरह से उचित नही कहा जा सकता है ना ही कोई तर्क ऐसे व्यवहार को उचित ही ठहरा सकता है। ये तो हैवानियत है हमारी संस्कृति में तो राक्षसों , रावण के सम्पूर्ण परिवार ने भी ऐसा नही किया। राक्षस वैद्य ने ही संजीवनी बूटी के बारे मे बताया था।

यह भारत की सनातन परंपरा है परन्तु यदि इस सनातन परंपरा के विरुद्ध कोई कार्य हो रहा हो तो उससे उसी प्रकार से निपटना होगा। दुष्ट के साथ दुष्ट का व्यवहार होना ही उचित और तर्कसंगत वर्तमान परिस्थितियों में है ताकि आम जन की जान को बचाया जा सके ये ही नीति है।

अब आप सोचे कि इस्लामिक देशों में इतनी कठोर सजा क्यों है क्योकि वे जानते है कि ये वो लोग नहीं है ये सामान्य सजा से नही मानेगे इसीलिए कठोर से कठोर सजा दी जाती है ये हम नही कह रहे है हम तो सिर्फ सब को देश हित में याद दिलाने का प्रयास कर रहे है कि जैसे के संग तैसा व्यवहार करें। अंग्रेजी में इसे टिट फॉर टैट कहते है।

आज समय की मांग है कि जब देश का राजा राजधर्म का मजबूती से पालन कर रहा हो तो प्रजा का भी नैतिक दायित्व कर्तव्य बोध के अन्तगर्त है कि प्रजा भी अपने ऋण को अपने राजा को समर्पित करे।ये ही हमारी सनातन संस्कृति और परंपरा है।

जय भारत
जय हिंद

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Prahlad Tandon

Basically I belongs to legal fraternity. For last twenty years I am providing my services to the people of India on behalf of Judiciary. I have done my graduation in commerce and completed my Master’s of Law . Thereafter inducted in Bihar Judicial Services, Later on in Uttar Pradesh Judiciary afterwards became member of Higher Judicial Services . Apart from I concentrated on Indian Institute of Management Kolkata and Successfully done. Execute Programme in Global Business Management (EPGBM). I am also providing my services to Indian Institute of Management Lucknow as a Guest Faculty on my vacations. Now, I realize at this juncture of my life that there is another horizon so I contemplated my services to this writing platform to aware myself and the people. I desire to be Blessed by People.

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