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साईमन कमीशन

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अन्तर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग, अमेरिका (USCIRF) ने अन्तर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर अपनी वार्षिक रिपोर्ट 2019 जिसमें जनवरी-2018 से लेकर दिसम्बर-2018 तक के मामले शामिल हैं। हालांकि कुछ घटनाएं 2019 की भी शामिल की गयी हैं जिसमें मुख्य आरोप है कि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थितियां लगातार खराब हुई हैं और धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमले बढ़े हैं एवं गौ-हत्या विरोधी कानूनों को तेजी से लागू किया गया।


इसी आधार पर अमेरिकी आयोग ने अन्तर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम (IRFA) के अन्तर्गत भारत को ’’विशेष चिन्ता का देश’’ टीयर-2 में श्रेणीबद्ध करते हुए सी0पी0सी0 (CPC-Countries of Particular Concern) सूची में रखा है। आयोग द्वारा भारत में धार्मिक स्वतंत्रता के मामलों में अन्वेषण और निगरानी वैश्विक स्तर पर किये जाने की अनुशंसा की है। सन् 2001 से सन् 2004 व सन् 2009 से सन् 2010 तक भारत आयोग की निगरानी सूची में था जिसकी आलोचना सम्पूर्ण भारतीय मीडिया द्वारा की गयी थी। आयोग द्वारा भारत सहित 14 अन्य देशों में भी धार्मिक स्वतंत्रता व अल्पसंख्यकों में हमले बढ़ने का आरोप लगाया था।


भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव की ओर से अमेरिकी अन्तर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग की वार्षिक रिपोर्ट की टिप्पणियों को खारिज करते हुए टिप्पणियों को पूर्वाग्रह और पक्षपातपूर्ण बताते हुए विरोध किया गया है कि ऐसे बयान नये नहीं हैं और ऐसे समय में गलत बयानी नये स्तर पर पहुंच गयी है। इस संस्था का ट्रैक रिकाॅर्ड ही ऐसा रहा है और बयान की निन्दा की है।


अन्तर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग, अमेरिका की स्थापना 1998 में अन्तर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम (IRFA) द्वारा की गयी थी। आयोग अमेरिका का एक स्वतंत्र द्विपक्षीय निकाय है। आयोग अन्तर्राष्ट्रीय मानको का उपयोग करते हुए वैश्विक स्तर पर धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन की निगरानी रखता है। आयोग अमेरिका के अतिरिक्त अन्य देशों की धार्मिक स्वतंत्रता हनन की निगरानी करता है।


अमेरिकी सरकार को की गयी सिफारिशों के अन्तर्गत प्रतिनिधि मण्डल की भारत यात्रा और वास्तविक स्थिति का मूल्यांकन व हितधारियों के साथ मिलने की अनुमति का भारत सरकार पर दबाव, धार्मिक अल्पसंख्यकों की निशाना बनाने वाले अपराधों से निपटने के लिये बहुवर्षीय रणनीति बनाने के लिये सरकार के साथ काम, भारतीय सरकार के सरकारी अधिकारियों व महत्वपूर्ण व्यक्तियों को सार्वजनिक रूप से फटकार लगाने की अपील, धार्मिक हिंसा के मामलों को रोकने और दण्डित करने के लिये पुलिस बल को मजबूत करना, साथ ही पीड़िता, गवाहों और पूजन स्थलों और अन्य पवित्र स्थलों की रक्षा करना, राष्ट्रीय व राज्य मानव अधिकार न्यायालयों की स्थापना के लिये मानव अधिकार के संरक्षण (संशोधन) विधेयक, 2018 को बनाया जाना, धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने वाले अपराधों के लिये अभियोगों की दर बढ़ाने के लिये राज्य अभियोक्ताओं के साथ काम करने हेतु कानून मंत्रालय की सहायता करना, ऐसी धार्मिक स्वतंत्रता और मानव अधिकारों पर अमेरिकी दूतावास का ध्यान बढ़ाना और अमेरिकी राष्ट्रपति, विदेश मंत्री तथा कांग्रेस की नीतियां बनाने की अनुशंसा करता है।


आयोग के अध्यक्ष टोनी पार्किन्स जो नौ कमिश्नर में से एक हैं। 4 मई 2018 को नियुक्त किया गया था जिस नियुक्ति का विरोध हिन्दू अमेरिकी संस्था द्वारा गैर ईसाई के विरूद्ध घृणित रवैया रखने के कारण किया गया था।


अन्तर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने इससे पूर्व जुलाई-2008 में तत्कालीन मुख्यमंत्री को न्यू जर्सी सम्मेलन में शामिल होने के लिये वीज़ा न देने का आग्रह किया था। अगस्त-2019 में असम में नागरिक रजिस्टर के विरूद्ध भी बयान जारी किया गया था एवं लोकसभा में नागरिक संशोधन बिल पास होने के बाद भी इसी प्रकार हाय-तौबा मचाई थी।


अन्तर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग के एक अन्य कमिश्नर तेनजिंग दोरजी ने स्वयं आयोग की रिपोर्ट से असहमति जताई है और उल्लेख है कि भारत में स्वयं लम्बे 30 वर्ष तक धार्मिक शरणार्थी के रूप में रहे थे। भारत एक प्रजातांत्रिक व न्यायिक प्रणाली वाला देश है। भारत एक प्राचीन महान सभ्यता वाला देश है जहां अनेक धर्म, संस्कृति, भाषा वाले लोग रहते हैं। आयोग के एक सदस्य ने भी अपनी असहमति लिखी है।
आयोग की अनुरीमा भार्गव जो पेशे से सिविल अधिकारिता मामलों की वकील हैं जिनकी नियुक्ति 11 दिसम्बर 2018 को कमिश्नर के रूप में हुई थी, उनका विचार है कि भारत एक समृद्ध, बहु-मस्तिष्क, जीवंत लोकतन्त्र है।


इसी अन्तर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग द्वारा अल्पसंख्यक ऊईगर मुस्लिमों के ऊपर चीन द्वारा किये जा रहे अत्याचारों, ईरान में अल्पसंख्यकों पर व पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों पर व मानव अधिकार उल्लंघन पर कभी कोई टिप्पणी नहीं की।


अमेरिकी आयोग द्वारा भारत में वास्तविक स्थिति का मूल्यांकन व हितधारियों के साथ मिलने की अनुमति का भारत सरकार पर दबाव डालने की सिफारिश की गयी है। ऐसा प्रतीत होता है कि भारत एक सार्वभौमिक राज्य न होकर अमेरिकी उपनिवेश हो और आयोग भारत राज्य में वास्तविक मूल्यांकन व हितधारियों के हित के लिये एक दूसरे साइमन कमीशन की नियुक्ति करना चाहता है। अमेरिका विश्व का ऐसा चैधरी बनना चाहता है कि सारे पंचायतें उसी की चैपाल में लगे और इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु एक अधिनियम अन्तर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम (IRFA) के अन्तर्गत अन्तर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग का गठन किया गया है।


अमेरिकी आयोग धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने वाले अपराधों से निपटने के लिये एक बहुवर्षीय रणनीति बनाने के लिये सरकार के साथ काम करना चाहता है, ऐसी अनुशंसा की गयी है। यानि देश के संविधान व संसद की आवश्यकता शेष नहीं रही है। आयोग अपने तमाम कमीशन व कमिश्नरों के साथ आयेगा और बहुवर्षीय नीति का निर्माण करेगा। शायद अब किसी नीति आयोग व अन्य कमीशन की आवश्यकता देश को नहीं रह जायेगी या शायद पूर्व में गुप्त रूप से ऐसी रणनीतियां साझा रूप से बनाई जाती रही हो और अपरोक्ष रूप से ऐसी रणनीतियों का अनुपालन कराया जाता रहा हो।


अमेरिकी आयोग भारत सरकार के सरकारी अधिकारियों व महत्वपूर्ण व्यक्तियों को सार्वजनिक रूप से फटकार लगाने की अपील की अनुशंसा की गयी है। जैसा कि राष्ट्रीय अल्पसंख्यक मंत्रालय ने जुलाई-2014 में अनुशंसा की है। यानि देश हित में कार्य करने वाले सरकारी अधिकारियों व महत्वपूर्ण व्यक्तियों को सार्वजनिक रूप से फटकारा जाये। शायद ऐसी ही नीतियों के कारण विगत वर्षाें से तमाम सरकारी अधिकारियों व महत्वपूर्ण पद पर बैठे को एक वर्ग विशेष के पक्ष में कार्य करने के लिये बाध्य किया जाता रहा है और वर्ग विशेष की हिमायत न होने पर सार्वजनिक रूप से दण्डित भी किया जाता है। सैकड़ों की संख्या में ऐसे उदाहरणों को इस देश की धरती से ही खोजा जा सकता है। शायद संचार क्रान्ति के चलते ऐसी रिपोर्ट आज इस देश के जनमानस तक पहुंच रही है और प्रत्येक देशवासी रिपोर्ट का अध्ययन कर निहितार्थ को भली भांति समझ सकता है।


अमेरिकी आयोग द्वारा पूजन स्थलों व अन्य पवित्र स्थलों की रक्षा के सम्बन्ध का भी उल्लेख है जिसका सीधा आशय अल्पसंख्यकों के धर्म व पूजा स्थलों से ही है। आयोग कौन से पूजा स्थलों की बात कर रहा है और इसका कैसे निर्धारण होगा कि कौन सा पूजा स्थल विधि अनुसार है और कौन सा पूजा स्थल बिना विधिक प्रक्रिया के है। चूंकि अमेरिका का संवैधानिक ढांचा विधिक प्रक्रिया (Due Process) के साथ कार्य करता है अतः ऐसी स्थिति में विधिक प्रक्रिया की बात किया जाना इस देश के सन्दर्भ में भी प्रासंगिक होगी। ऐसी स्थिति में सभी धर्म स्थलों का चिन्हीकरण किया जाना आवश्यक हो जाता है और इस सन्दर्भ में नियम बनाया जाना भी आवश्यक है कि कौन से धर्मस्थल स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् मौजूद थे और उसके पश्चात् बिना विधिक अनुमति प्राप्त किये व बिना विधिक प्रक्रिया अपनाये बनाये गये हैं। और यदि बिना विधिक प्रक्रिया के ऐसे धर्म स्थल बनाये गये हैं तो ऐसी दशा में इन धर्म स्थलों का क्या होगा।


अमेरिकी आयोग द्वारा राष्ट्रीय व राज्य मानव अधिकार न्यायालयोें की स्थापना के लिये मानव अधिकार के संरक्षण (संशोधन) विधेयक, 2018 को प्रोत्साहित करना। आज इस संचार क्रान्ति को सौ-सौ नमन करने की आवश्यकता है कि विदेशी कार्यनीति को न जाने कब से इस देश में प्रोत्साहित किया जा रहा था या बड़े गुपचुप तरीके से उन्हीं नीतियों का न केवल देश में लागू किया जाना परिलक्षित है बल्कि शायद ये विदेशी कार्य नीतियां ही देश के स्तम्भों को संचालित कर रही थी।


अमेरिकी आयोग धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने वाले अपराधों के लिये अभियोगों की दर बढ़ाने के लिये राज्य अभियोक्ताओं के साथ काम करने हेतु कानून मंत्रालय की सहायता करना। जबकि सम्पूर्ण देश द्वारा अपनी सारी शक्ति अभियोगों की दर घटाने पर लगा रखी है और तमाम वादों का निस्तारण त्वरित करने का भागीरथ प्रयास किया जा रहा है जबकि अमरीकी आयोग अभियोगों की दर बढ़ाये जाने पर जोर देता है और पूर्व में शायद इसी रणनीति के अन्तर्गत देश में अभियोगों की बाढ़ लाई गयी है और जिसका उद्देश्य देश के न्याय को लगभग पंगु बनाने की स्थिति की ओर ले जाना है क्योंकि जब किसी देश की न्याय प्रणाली असफल हो जाती है तो देश में स्वाभाविक रूप से अराजकता फैल जाती है। शायद देश की न्याय प्रणाली को नाकाम विनष्ट करने की गहरी साजिश न जाने कब से चल रही है और देश को विनाश के कगार पर ले जाने का सतत् प्रयास चल रहा था।


माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अल्पसंख्यकों को लेकर निर्देश फरवरी-2019 में अल्पसंख्यक आयोग को दिशा निर्देश बनाये जाने हेतु दिये गये थे। जिसमें जम्मू-कश्मीर राज्य में (68.30 प्रतिशत), लक्षदीप में (96.20 प्रतिशत) मुस्लिम बहुसंख्यक हैं। इन राज्यों के अलावा आसाम (34.20 प्रतिशत), पश्चिम बंगाल (27.50 प्रतिशत), केरल (26.60 प्रतिशत), उत्तर प्रदेश (19.30 प्रतिशत) और बिहार में (18.00 प्रतिशत) मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं। माननीय सर्वोच्च न्यायालय के इस सम्बन्ध में स्पष्ट निर्देश राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को हैं कि अल्पसंख्यकों का निर्धारण राज्य की जनसंख्या के अनुसार ही होना चाहिए। ऐसे अनेक राज्य जहां जनसंख्या में वे अल्पसंख्यक नहीं हैं, तब भी अल्पसंख्यक सुविधा का लाभ लिया जा रहा है।


इस प्रकार आज इस देश में यह महती आवश्यकता उत्पन्न हो गयी है कि अल्पसंख्यकों का क्या प्रतिशत निर्धारित होना चाहिए कि कितने प्रतिशत होने पर वे अल्पसंख्यक होंगे और उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा मिलेगा या नहीं मिलेगा। यह प्रतिशत निर्धारित होने के पश्चात् ही सम्भव है। जून-2014 में तत्कालीन अल्पसंख्यक मंत्रालय की मंत्री मा0 नजमा हेपतुल्ला द्वारा यह स्वयं उल्लेख किया गया था कि भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यक नहीं हैं बल्कि पारसी अल्पसंख्यक हैं। भारत में पारसियों की संख्या 69,000 है। उनके अनुसार एक छोटा वर्ग ही पारसियों की तरह अल्पसंख्यक वर्ग में हो सकता है। इस प्रकार मुस्लिम अल्पसंख्यक वर्ग नहीं है। इसी बात को लेकर भारत देश के पहले शिक्षा मंत्री अब्दुल कलाम आजाद ने सन् 1940 में राष्ट्रपति के प्रति सम्बोधन (Presidential Address) में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के रामगढ़ अधिवेशन में कहा था कि राजनीतिक उद्देश्य के लिये अल्पसंख्यक ऐसा कमजोर वर्ग है जो संख्या और सलाहियत (Salahyt) में अपने आप को ज्यादा ताकतवर वर्ग से सुरक्षा देने में असमर्थ है।


आज जब सारी वस्तुःस्थिति सार्वजनिक पटल पर है तो ऐसी नीति व नियन्ताओं पर भी सार्वजनिक बहस की आवश्यकता है और ऐसी स्थिति में आज देश की सरकार का दायित्व है कि क्या देश ऐसी ताकतों के प्रभाव में नीतियों का निर्माण कर रहा था और यदि किसी भी बाहरी ताकतों के प्रभाव में नीति, नियम, कानून बनाये जा रहे थे तो ऐसी स्थिति में सम्पूर्ण परिस्थितियों का पुनः मूल्यांकन व आंकलन किया जाना आवश्यक है और किसी निष्पक्ष जांच एजेन्सी या किसी सर्वोच्च समूह का गठन करते हुए गम्भीरता को समझते हुए जांच कराया जाना आवश्यक है।

जय भारत
जय हिन्द

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Prahlad Tandon

Basically I belongs to legal fraternity. For last twenty years I am providing my services to the people of India on behalf of Judiciary. I have done my graduation in commerce and completed my Master’s of Law . Thereafter inducted in Bihar Judicial Services, Later on in Uttar Pradesh Judiciary afterwards became member of Higher Judicial Services . Apart from I concentrated on Indian Institute of Management Kolkata and Successfully done. Execute Programme in Global Business Management (EPGBM). I am also providing my services to Indian Institute of Management Lucknow as a Guest Faculty on my vacations. Now, I realize at this juncture of my life that there is another horizon so I contemplated my services to this writing platform to aware myself and the people. I desire to be Blessed by People.

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