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आ अब लौट चलें

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कोरोना वायरस ने पूरे समाज को व्यक्तिगत, सामाजिक दूरी बनाये रखने को वैश्विक रूप से मजबूर कर दिया है और भविष्य में भी आम जीवन जीने की शैली बदलने को मजबूर होना पड़ेगा। भविष्य में जीवन के अलावा सामाजिक सम्पर्क व व्यापार आदि के नियम भी बदलने होंगे।


इस समाज के सम्पूर्ण व्यक्तियों को चाहे वह विश्व के किसी भी स्थान के हों, मुंह पर मास्क के साथ रहने को विवश कर दिया है। अब यदि भारतीय संस्कृति को देखा जाये तो मुंह को ढाकने की परम्परा बौद्ध-जैन समाज में सामान्य रूप से देखने को आज भी मिलती है। किसी भी जैन समाज को विश्व में मुंह ढकते हुए देखा जा सकता है। बौद्ध-जैन ऋषि मुनियों को प्राचीन समय से ही ज्ञात था कि हवा में छोटे-छोटे कीटाणु जीव हैं जो उनकी सांस के साथ अन्दर चले जायेंगे। इसीलिये मुनियों ने उसे जीव हत्या का पाप लगेगा बताया। असल में ऋषि मुनि उन सूक्ष्म जीवों से इस मानव समाज को ही बचाना चाहते थे।


बौद्ध दर्शन में चार आर्य सत्यों के बारे में उपदेश भगवान बुद्ध ने सारनाथ, वाराणसी में दिया था जिसे प्रथम धर्म चक्र प्रवर्तन भी कहा जाता है। ये चार आर्य सत्य हैं – दुःख, दुःख का कारण, दुःख का निरोध, दुःख निरोध का मार्ग (आष्टांगिक मार्ग अथवा मध्यम मार्ग भी कहा जाता है)। इन्हीं चार आर्य सत्यों में दूसरा सत्य है दुःख का कारण जिसे 12 निदानों के द्वारा समझाया गया है – दुःख शारीरिक, मानसिक, शोक, रोग, बुढ़ापा, मृत्यु इत्यादि इनका कारण हैं। दूसरा स्पर्श, तीसरा विज्ञान, चैथा संस्कार, पांचवा अविद्या। इस 12 में से मुख्य रूप से वर्तमान परिस्थितियों में ये पांच ही दुःख का मुख्य कारणकर्ता हैं।


इस विज्ञान ने दुःख को बताया कि मृत्यु का कारण हो सकता है, यदि आपने संस्कार का पालन नहीं किया। विज्ञान ने ही बताया कि आप अशिक्षित हैं और मूढ़ अशिक्षित होने के कारण आज आपकी यह दुर्दशा है क्योंकि आपने अपने संस्कार, संस्कृति, दर्शन को त्याग दिया था या विमुख हो गये थे। प्राचीन समय में ऋषि-मुनियों को ज्ञान था और इसी उद्देश्य के लिये दुःख का एक कारण स्पर्श को भी बताया गया था और स्पर्श करने से मना किया गया था। यही बौद्ध-जैन संस्कृति है। जो आज इसका पालन करते हैं उनको कोई कष्ट नहीं है। बौद्ध-जैन धर्म दोनों अहिंसा पर जोर देते हैं कि छोटे से छोटे जीवाणु की भी जीव हत्या है, इसको मानते हैं। जैन धर्म में आत्मकलेष से इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने को कहा जाता है।


प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव आदिनाथ प्रगैतिहासिक पुरूष जिन्होंने जैन धर्म की पुनर्स्थापना की, आपके ही पुत्र भरत चक्रवर्ती सम्राट हुए जिनके नाम से इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। इस वैभवशाली धर्म को चक्रवर्ती सम्राट अशोक (ईसा पूर्व 232 से ईसा पूर्व 304) ने कलिंग युद्ध में क्षति के शोक से उबरने के लिये बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया और अपने धर्म प्रचारकों को धर्म प्रचार के लिये विश्व भर में भेजा। आज जापान, चीन जैसे शक्तिशाली देश भी बौद्ध धर्म को मानते हैं। चीन बौद्धों की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है। दुनिया की 18 प्रतिशत बौद्ध आबादी चीन में रहती है। इसके अलावा 13 अन्य देश भारतीय संस्कृति के अनुयायी व पोषक देश हैं।


इस प्रकार इस समस्या बीमारी का निदान भी इसी धर्म में दिया हुआ है जिसका अनुसरण करना चाहिये – सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाक, सम्यक् कार्य, सम्यक् जीविका, सम्यक् प्रयास, सम्यक् स्मृति (ज्ञान), सम्यक् समाधि द्वारा ही इस समस्या से निजात पाई जा सकती है एवं निश्चित रूप से शाश्वत धर्म की ओर लौटना ही एकमात्र उपाय है।

जय भारत
जय हिन्द

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4 COMMENTS

  1. आलेख का कुल सन्देश अच्छा है, पर अनेक तथ्य घाल-मेल से परोसे गए हैं .
    सन्देश अच्छा होने के कारण बधाई

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Prahlad Tandon

Basically I belongs to legal fraternity. For last twenty years I am providing my services to the people of India on behalf of Judiciary. I have done my graduation in commerce and completed my Master’s of Law . Thereafter inducted in Bihar Judicial Services, Later on in Uttar Pradesh Judiciary afterwards became member of Higher Judicial Services . Apart from I concentrated on Indian Institute of Management Kolkata and Successfully done. Execute Programme in Global Business Management (EPGBM). I am also providing my services to Indian Institute of Management Lucknow as a Guest Faculty on my vacations. Now, I realize at this juncture of my life that there is another horizon so I contemplated my services to this writing platform to aware myself and the people. I desire to be Blessed by People.

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