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वरना चिड़िया चुग जाये खेत

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’’भूखे भजन न होय गोपाला।’’
’’अब पछताये का होत है,
जब चिड़िया चुग गयी खेत।’’

उत्तर प्रदेश में ’कई श्रम कानूनों में अस्थाई छूट’ का अध्यादेश उत्तर प्रदेश मंत्री परिषद ने मंजूर करते हुए अनुमोदन हेतु केन्द्र सरकार को प्रेषित किया है। जिसके अन्तर्गत कारखानों और विनिर्माण उद्योगों को वर्तमान समय में प्रवर्धित श्रम कानून से 3 वर्ष की छूट का प्राविधान किया है। यद्यपि राज्य सरकार ने –

  • भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिक (रोजगार और सेवा शर्त विनियमन) अधिनियम 1996
  • कामगार क्षतिपूर्ति अधिनियम 1923
  • बंधुआ मजदूर अधिनियम 1976
  • मजदूरी भुगतान अधिनियम 1936 की धारा-5
    आदि कानून लागू रहेंगे एवं
  • औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947, ट्रेड यूनियन ऐक्ट 1926 आदि अगले 3 वर्ष तक प्रचलन से स्थगित रहेंगे। इसका लाभ नये कारखानों, उद्योगों और विनिर्माण पर लागू होगा।

जिस पर तमाम राजनेताओं का बयान आने शुरू हो गये हैं और श्रम कानूनों में किये गये बदलावों को रद्द करने की मांग भी एक बड़े राजनीतिक दल के नेता द्वारा की जा रही है और कहा गया है कि मजदूर देश का निर्माता है।

राजनेताओं के अतिरिक्त कई अर्थशास्त्री और कई बड़े मीडिया हाऊस भी इस बात का समर्थन करते नजर आ रहे हैं कि देश को 100 वर्ष पूर्व की स्थिति में ले जाया जा रहा है। और बड़े आश्चर्य की बात है कि कई अर्थशास्त्री भी इस बात में अपनी सहमति दर्ज करा रहे हैं।

ऐसे अवसर पर मुझे दो किवदंतियां याद आ रही हैं जिसमें पहली कबीर दास की दो लाईनें –

’’पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंण्डित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पण्डित होय।’’

अर्थात् बड़ी-बड़ी पुस्तकें पढ़कर सभी विद्वान हो सके, ऐसा नहीं है। इस बात पर मूर्धन्य विद्वान डाॅ0 नामवर सिंह ने अपने एक संस्मरण में लिखा है कि, ’’जब वे गांव जाते थे तो गांव वाले कहते थे ’भैया कब तक पढ़ोगे, बूढ़े हो जाओगे। और पण्डितों की ओर देखता हूॅ तो संकोच होता है कि अभी पढ़ा ही क्या है। और सीधी सादी टालने वाली हंसी के अलावा इसका जवाब कभी नहीं सूझा।’’ वही स्थिति गम्भीर विश्लेषण के बाद मेरी भी हो जाती है कि कुछ सूझता ही नहीं। फिर भी मैं आमादा हॅू कि विश्लेषण भी करूंगा और लिखूंगा भी।

दूसरी किवदंती इस समय पर याद आ रही है कि – ’’भूखे भजन न होय गोपाला, अपनी ले लो कंठी माला’।’’

जिसको अमेरिकी वैज्ञानिको ने भी एक शोध में इस बात की पुष्टि की है कि भूख लगने पर लोगो के व्यवहार में बदलाव आता है और मन अशान्त हो जाता है। भूख की वजह से नाराजगी या गुस्सा आना स्वाभाविक है। संस्कृत के नीति शास्त्र में कहा गया है कि विद्यार्थी को भरपेट, गृहस्थ को 32 कौर, वानप्रस्थ आश्रम धारण करने वाले को 16 कौर और सन्यास ग्रहण करने वाले को 8 कौर भोजन करना चाहिए। सामान्य सी बात है, यह सारे नियम सामान्य आम नागरिकों के लिये ही बनाये गये थे। वैभवशाली समृद्ध अभिजात्य वर्ग अन्य सामाजिक बन्धनों की तरह इस नियम से मुक्त है। शायद मैं मुख्य विषय से भटक गया हॅू, विषय पर वापस आता हॅू।

पहली किवदंती पर वापस लौटते हुए जिस बात को मैंने हंसी में टालने का प्रयास किया परन्तु टाल न सका। इन अर्थशास्त्री, विद्वानों से प्रश्न पूंछने का साहस तो मैं नहीं जुटा सकता परन्तु इतना बताया जाना आवश्यक है कि यदि सारे विश्व का चीन से संशय के कारण मोह भंग हो रहा है तो वे अपने-अपने कल-कारखाने, उद्योग लगाने कहां जायेंगे। निश्चित रूप से सारा विश्व जो चीन ने समेट रखा है, वो चीन से आज नहीं तो कल चीन की धरती को छोड़ेंगे और उन उद्योगों को निश्चित रूप से दूसरी धरती चाहिए ही होगी। तो कोई भी आपके घर कब आयेगा, जब आप उसका स्वागत सत्कार करेंगे अन्यथा वो आपके घर नहीं आयेगा। यह सीधा सपाट सामाजिक नियम है जो अर्थशास्त्र पर भी लागू होता है। पता नहीं सबके कितना समझ में आया है।

अब दूसरी किवदंती पर आते हैं। जब आपके पास कल-कारखाने, उद्योग होंगे तभी रोजगार होगा, और जब रोजगार होगा तो पेट भरेगा, और जब पेट भरेगा तो काम में मन लगेगा। देश की तरक्की में तभी योगदान किया जाना सम्भव है। वरना भीड़ की भीड़ जो आज सड़क पर उतरी दिख रही है, जो एक वक्त खाने को परेशान हैं और कई-कई दिनों से भूखे हैं। क्या कोई भी ऐसी समृद्धशाली विधि या कानून है जो इन भूखे व्यक्तियों को भोजन करा सके। स्वाभाविक रूप से प्रश्न का उत्तर ’नहीं’ में आयेगा। केवल और केवल रोजगार ही भूख को मिटा सकता है।

आज जो अभिजात्य वर्ग एयर कंडीशन में बैठा है, ये वो ही वर्ग है जिसका मैंने ऊपर वर्णन किया है, जिनको किसी निवाले की गिनती का मतलब ही नहीं पता है क्योंकि वो नियम तो आम जन के लिये ही है। तो चलिए मैं आपको पुनः बताने का प्रयास करता हॅू, शायद समझ में आ जाये कि आज भीड़ की भीड़ सड़क पर क्यों उतरी है। वो इसलिए उतरी है कि समस्त भीड़ अपना रोजगार खो चुकी है, कल-कारखानें, उद्योग-धन्धे बन्द हो चुके हैं और इसीलिए अर्थव्यवस्था पटरी से उतर गयी है और सड़क पर भीड़ ही भीड़ नजर आ रही है। उन बेरोजगार खाली पेट व्यक्तियों से पूंछे कि एक निवाले का क्या महत्व है और आप सब विधि का उपदेश और अधिकार उन निरीह भूखे प्राणियों को देने में अपना समय व्यर्थ कर रहे हैं।

हम किसी अधिकार की बात तो तब करेंगे जब रोजगार होगा, पेट भरा होगा। तब ही तो किसी अधिकार और गारंटी की बात होगी। जब रोजगार ही नहीं होगा, भुखमरी चारों तरफ होगी, लोग कीड़े-मकौड़े की तरह मर रहे होंगे तो किस बात का अधिकार और किसके लिये रहेगा। पहली प्राथमिकता भूख मिटाने की है, न कि विधि और कानून के अधिकार की।

आज मुख्य प्रश्न देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की व नये उद्योग-धन्धों, कल-कारखानों को स्थापित किये जाने और कराये जाने की है एवं रोजगार वापसी की ओर गम्भीरतापूर्वक एक प्रयास करते हुए रणनीति बनाये जाने की आवश्यकता है। और इसी रणनीति के अन्तर्गत सरकार द्वारा उक्त प्रलोभनात्मक उपायों को क्रियान्वित करने का प्रयास किया जा रहा है जिससे की नये कल-कारखाने, उद्योग-धन्धें राज्य में स्थापित होने की जमीन प्राप्त कर सके। जिसमें विपक्ष की रचनात्मक भूमिका की आवश्यकता है एवं विपक्ष द्वारा निश्चित रूप से हमेशा विपक्ष में रहने की सोच बदले जाने की आवश्यकता भी है। यह किसी काॅलेज की वाद-विवाद प्रतियोगिता का मंच नहीं है जहां पर पक्ष और विपक्ष होता है। यह देश की महत्वपूर्ण अर्थ व्यवस्था की अर्थ नीतियां हैं जिसके लिये विपक्ष के रचनात्मक महती सुझावों की आवश्यकता है। वरना अभी तो 100 वर्ष पीछे नहीं लौटे हैं। अगर इसी प्रकार की स्थिति रही और इसी प्रकार अपने ही टांग घसीटने का रवैया रहा तो 100 वर्ष पीछे लौटने में समय शेष नहीं है और जिसकी भरपाई किया जाना भी सम्भव नहीं होगा। अभी भी समय शेष है, पक्ष-विपक्ष की आधारभूत रूढ़ीवादी सोच को देशहित में त्यागना ही श्रेष्ठ हितकर है वरना परिणाम के भागीदार हम सभी होंगे। और अन्तिम में तीसरी किवदंती चरितार्थ हो जायेगी – अब पछताये का होत है, जब चिड़िया चुग गयी खेत।

जय भारत
जय हिन्द

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2 COMMENTS

  1. अब लघु कुटीर उद्योग (जो घर से भी हो सके) का समय आ गया हैं।पर कानून,लाइसेंस, मकड़जाल से छुटकारा पाने का भी समय आ गया हैं।
    इसके लिये सरकार को आसान चिंतामुक्त कानून बनाना होगा।
    वन्देमातरम

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Prahlad Tandon

Basically I belongs to legal fraternity. For last twenty years I am providing my services to the people of India on behalf of Judiciary. I have done my graduation in commerce and completed my Master’s of Law . Thereafter inducted in Bihar Judicial Services, Later on in Uttar Pradesh Judiciary afterwards became member of Higher Judicial Services . Apart from I concentrated on Indian Institute of Management Kolkata and Successfully done. Execute Programme in Global Business Management (EPGBM). I am also providing my services to Indian Institute of Management Lucknow as a Guest Faculty on my vacations. Now, I realize at this juncture of my life that there is another horizon so I contemplated my services to this writing platform to aware myself and the people. I desire to be Blessed by People.

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