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बांसुरी वादक

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विश्व के इसी तरह सभी महान बांसुरी वादक अपने आपको शान्ति का महान पुरस्कार व रत्न से समय-समय पर पुरस्कृत कराते हुए इसी निरीह जनता की हत्या या हारा-किरी किये शवों के ढेर की चोटी पर खड़े होकर उक्त पुरस्कारों को बड़े गौरव से प्राप्त कर गर्व से गौरवान्वित होते है।

एक बहुत बड़े उद्योगपति द्वारा कहा गया है कि अगर लाॅकडाउन लम्बे समय तक बढ़ता है तो यह आर्थिक हारा-किरी (आत्मघाती) साबित हो सकता है। आगे कहा है कि कार्यशील और बढ़ती अर्थव्यवस्था आजीविका के लिये एक प्रतिरक्षा प्रणाली की तरह है। लाॅकडाउन इस प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर करता है और गरीबों को सबसे अधिक नुकसान होता है।

इस सभी समाचारों के केन्द्र में मजदूर है या तो प्रवासी मजदूर है। आर्थिक नीति अगर ध्वस्त हो जायेगी तो अर्थव्यवस्था के लिये हारा-किरी (आत्मघाती) है। इसी पर देश के बड़े विपक्षी दल के दो नेताओं का कहना है कि श्रम कानूनों में संशोधन मानव अधिकार को रौंदने, असुरक्षित कार्य स्थलों की अनुमति, श्रमिकों के शोषण और उनकी आवाज दबाने का बहाना नहीं हो सकता। और इन मूलभूत सिद्धान्तों पर कोई समझौता नहीं हो सकता। दूसरे बड़े नेता ने भी कहा है कि जमीन, मजदूर और पर्यावरण के नियम-कानून में ढील देने की योजना खतरनाक और विनाशकारी होगी।

मैंने बचपन में एक कहानी पढ़ी थी जो मेरे मानस पटल पर कुछ धुंधली यादों के रूप में अभी भी शेष है। सोचा कि आपको भी आपकी बचपन की यादों को याद करा दूं। एक बार रोम देश में लाखों की संख्या में चूहे पैदा हो गये और राजा व जनता उन चूहों से तंग आ गयी, सारे राज्य में मुनादी करवाई गयी कि जो चूहे भगायेगा उसको राजकीय सम्मान दिया जायेगा। एक बांसुरी वाला जादूगर राजा के सामने आता है और बताता है कि वह इन चूहों को ले जायेगा और राजा के कहने पर बांसुरी वाला अपनी बांसुरी बजाना शुरू करता है और उसकी ध्वनि के सम्मोहन से सारे चूहे उसके पीछे चलने लगते हैं। धीमे-धीमे बांसुरी वाला आगे बढ़ते हुए नदी में उतर जाता है। सारे चूहे भी धीमे-धीमे कर नदी में उतर जाते हैं। और इस तरह चूहों का प्रकोप समाप्त हो जाता है।

भारत के ही नहीं, विश्व के सारे राजनीतिकगण सामान्य रूप से जनता के अधिकार व भलाई के नाम पर ऐसी ही सम्मोहित करने वाली ध्वनि बजाते हैं। इन सभी बांसुरी वालों के ध्वनि सम्मोहन से दुनिया का जितना अहित हुआ है उसका आंकलन नहीं किया जा सकता। वह लगातार देश व जनता के अधिकार के लिये रणनीति बनाते हुए व जनता की भलाई के लिये स्वयं को युद्धरत दिखाने का प्रयास करते हैं। इसके क्या परिणाम हो रहे हैं, देश व समाज का क्या हो रहा है, जनता के परिवार में क्या हलचल हुई जा रही है, इससे इनको कोई मतलब नहीं है।

ये बांसुरी वादक हमेशा यही समझाते रहते हैं कि अपना एक महान देश है और जनता के इसी महान अधिकार व मानव भलाई की आड़ में यह राजनीतिक खेल चलता रहता है। हमारा पिछले चार हजार सालों का इतिहास बताता है कि विश्व मेें कुल 12,703 लड़ाईयां जनता के इसी अधिकार के लिये लड़ी गयी हैं। हमारी सोच में प्रथम व द्वितीय विश्व युद्ध अभी मात्र थोड़ा धुंधला ही हुआ है और हाल ही में खाड़ी मेें भी युद्ध की घटनाएं हुई हैं जिसको जनता अभी भूली नहीं होगी। सन् 1947 की भारत विभाजन त्रासदी इसी अधिकार की और दो समुदायों की भलाई की लड़ाई थी और इन्हीं महान बांसुरी वादकों ने यह अधिकार की लड़ाई करवाई थी। किस जनता को कितना अधिकार मिला है और कितनी किस समुदाय की भलाई हुई, यह शायद बताने की आवश्यकता नहीं है। इन तमाम युद्धों में सिर्फ और सिर्फ निरीह जनता ही मारी गयी है, पिसी है और युद्ध की विभीषिका से बिलबिला उठी है जिसका कोई लेखा-जोखा उपलब्ध नहीं है। यह राज्य द्वारा प्रायोजित जनता की हारा-किरी (आत्महत्या) को विवश करने का बेहतर उदाहरण है।

मैं अब आपको तस्वीर का दूसरा रूप भी दिखाना चाहता हॅू कि इन सभी युद्धों में सिर्फ और सिर्फ जनता या सेना के असंख्य व्यक्ति ही मरे हैं और जो बचे हैं वे हारा-किरी (आत्महत्या) को विवश हुए जिनकी गणना किया जाना भी सम्भव नहीं है। ’द न्यूयाॅर्क टाईम्स’ के अनुसार करीब 100 करोड़ व्यक्ति ज्ञात मानव इतिहास में युद्ध विभीषिका में मरा है या मारा गया है। क्या कभी आपने किसी महान बांसुरी वादक को हत होते देखा है या सुना है। इतिहास उठा के देखें, आपकी समझ में आ जायेगा।

बड़े-बड़े राष्ट्रों द्वारा अपनी बड़ी-बड़ी सेनाएं इसी जनता के तथाकथित अधिकार की रक्षा एवं भलाई के लिये बनाई जाती हैं और हर वर्ष अरबों की धनराशि इसी अधिकार व मानव भलाई की तैयारी के नाम पर खर्च की जाती हैं। प्रत्येक युद्ध में सेना के कितने जवान मरे, इसकी तो गिनती उपलब्ध हो जाती है परन्तु कितनी निरीह जनता मर गयी, इसका कोई सही आंकड़ा कभी किसी भी देश द्वारा उपलब्ध नहीं कराया जाता। और विश्व के इसी तरह सभी महान बांसुरी वादक इस वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अपने आपको शान्ति का महान पुरस्कार व रत्न से समय-समय पर पुरस्कृत कराते हुए इसी निरीह जनता की हत्या या हारा-किरी शवों के ढेर की चोटी पर खड़े होकर उक्त पुरस्कारों को बड़े गौरव से प्राप्त कर गर्व से गौरवान्वित होते हैं।

जय भारत
जय हिन्द

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Prahlad Tandon

Basically I belongs to legal fraternity. For last twenty years I am providing my services to the people of India on behalf of Judiciary. I have done my graduation in commerce and completed my Master’s of Law . Thereafter inducted in Bihar Judicial Services, Later on in Uttar Pradesh Judiciary afterwards became member of Higher Judicial Services . Apart from I concentrated on Indian Institute of Management Kolkata and Successfully done. Execute Programme in Global Business Management (EPGBM). I am also providing my services to Indian Institute of Management Lucknow as a Guest Faculty on my vacations. Now, I realize at this juncture of my life that there is another horizon so I contemplated my services to this writing platform to aware myself and the people. I desire to be Blessed by People.

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